हिन्दी

फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन बोर्ड ने पुरस्कार विजेता फ़िल्म 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' को सेंसर किया, भारत इज़राइल रिश्ते 'टूटने' का दिया हवाला

यह हिंदी अनुवाद अंग्रेज़ी मूल लेख India’s film certification board censors award-winning The Voice of Hind Rajab, citing “harm” to India-Israel relations से किया गया है।

भारत के केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) ने पुरस्कार विजेता और ऑस्कर नामांकित फ़िल्म 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' के सार्वजनिक सिनेमाघरों में प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। सीबीएफ़सी ने खुलकर ये तर्क दिया है कि इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदू वर्चस्ववादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार और इज़राइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की जनसंहारक ज़ॉयोनिस्ट सरकार के बीच बनी रणनीतिक साझेदारी को नुक़सान पहुंचेगा।

फ़िल्म 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब'

भारत में हर फ़िल्म, चाहे वो घरेलू हो या विदेशी, उसे सीबीएफ़सी की जांच से होकर गुजरना पड़ता है और इसके सार्वजनिक रिलीज़ के लिए इसका सर्टिफ़िकेशन ज़रूरी होता है। अपने सभी उद्देश्यों में सीबीएफ़सी, बीजेपी की हिंदू-वर्चस्ववादी और निरंकुश राजनीतिक विचारधारा को स्वाभाविक रूप से लागू करने वाली एक संस्था का रूप ले चुकी है। इसके चेयरमैन और बोर्ड के सभी 10 सदस्यों की नियुक्ति, कला में मामूली जानकारी रखने के बावजूद, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से जानबूझ कर की गई 'राजनीतिक नियुक्ति' है।

पिछले सितम्बर में जब वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में 'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' का प्रीमियर किया गया था तो यह दर्शकों के दिल को इतना छू गई कि हॉल 20 मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। फ़िल्म ने दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार, सिल्वर लॉयन - ग्रैंड जूरी प्राइज़ जीता। ऑस्कर के लिए बेस्ट इंटरनेशनल फ़ीचर फ़िल्म की श्रेणी में भी इसे नॉमिनेट किया गया था, लेकिन यह पुरस्कार नहीं जीत सकी। अमेरिका में वितरक खोजने में कुछ मुश्किलें झेलने के बाद, फ़िल्म को अब निर्माण कंपनी की डिस्ट्रिब्यूटर विंग 'विला' के माध्यम से रिलीज़ किया गया है।

शुरू से ही, मोदी सरकार ने ग़ाज़ा में फ़लस्तीनियों की सामूहिक हत्याओं का पुरजोर समर्थन किया है। ग़ाज़ा में अत्याचार के ख़िलाफ़ भारत में हर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर मोदी सरकार ने पुलिसिया हिंसा का जमकर इस्तेमाल किया।

इस फ़िल्म को ट्यूनीशिया की प्रतिभावान फ़िल्म मेकर काउथर बेन हानिया ने लिखा और निर्देशित किया है। इसमें पांच साल की फ़लस्तीनी बच्ची हिंद रजब के भयानक अंजाम को दिखाने की कोशिश की गई है। यह बच्ची ग़ाज़ा में एक कार में अपने चाचा, चाची और दो चचेरे भाई बहनों की लाशों के बीच फंस गई थी और इसके बाद वो फ़लस्तीन के बचाव कर्मियों से फ़ोन पर मदद की लगातार गुहार लगाती रही। ये लोग ग़ाज़ा में एक सुरक्षित जगह जाने की कोशिश कर रहे हैं और तभी इसराइली सेना के टैंक से इनकी कार पर जानबूझकर फ़ायरिंग कर उस बच्ची के चाचा, चाची और उनके बच्चों की हत्या कर दी गई। इस हमले में बच गए इस बच्ची और उसके एक कज़िन की भी उसी दौरान 29 जनवरी 2024 को हत्या कर दी गई थी। रजब और उसके रिश्तेदारों की सड़ी गली लाश, घटना के 12 दिन बाद 10 फ़रवरी 2024 को निकाली गई।

हिंद रजब अपने सीनियर किंगरगार्टन में

'वैरायटी' से बात करते हुए जय विरत्रा एंटरटेनमेंट के भारतीय फ़िल्म वितरक मनोज नंदवाना के अनुसार, फ़िल्म को सीबीएफ़सी के सामने 27 फ़रवरी को प्रदर्शित किया गया था। उन्होंने कहा कि 16 मार्च को ऑस्कर आयोजन से पहले, वह छह मार्च को इस फ़िल्म के रिलीज़ की उम्मीद कर रहे थे। ऑस्कर में यह फ़िल्म नॉमिनेट की गई थी। बिना कोई कारण बताए जब सीबीएफ़सी ने सर्टिफ़िकेट देने से इनकार कर दिया तो उनकी उम्मीद टूट गई। कथित तौर पर उन्हें सीबीएफ़सी के एक सदस्य ने बताया था कि यह 'बेहद संवेदनशील' मामला है और 'अगर इसे रिलीज़ किया जाता है तो इससे भारत-इज़राइल संबंध टूट जाएंगे।'

यह प्रतिबंध पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी है, क्योंकि सिनेमैटोग्राफ़ अधिनियम, 1952 के अनुसार, 'किसी भी फ़िल्म के संबंध में जारी किया गया सर्टिफ़िकेट या इसे जारी करने से इनकार करने का आदेश भारत के गैज़ेट में प्रकाशित किया जाना अनिवार्य है।' (ज़ोर दिया गया)। सीबीएफ़सी द्वारा भारत के गैज़ेट में ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई, जोकि भारत सरकार का आधिकारिक क़ानूनी दस्तावेज़ है।

भारत के प्रति अपने प्रेम को ज़ाहिर करने वाली काउथर बेन हानिया ने अपने फ़ेसबुक पेज पर इस सेंसरशिप के पीछे की मंशा पर तंज़ करते हुए सवाल किया है-

“मैं इंडिया को प्यार करते हुए बड़ी हुई। बॉलीवुड मेरे बचपन का हिस्सा रहा था। एक समय तो मैंने खुद को ख़ास महसूस करने के लिए यह भी कल्पना कर ली थी कि मेरी जड़ें इंडिया से जुड़ी हुई हैं। ....क्या 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र' और 'मध्य पूर्व के एकमात्र लोकतंत्र' के बीच का हनीमून इतना नाज़ुक है कि एक फ़िल्म उसे तोड़ देगी? आपके विचार जानना चाहूंगी।“

सीबीएफ़सी के प्रतिबंध की निंदा भारत, इज़राइल और अमेरिका सहित दुनिया भर के 90 से अधिक फ़िल्म निर्माताओं, अकादमिक जगत के विद्वानों और एक्टिविस्टों ने की है। उन्होंने एक बयान जारी कर एक कलात्मक कृति पर खुलेआम सेंसरशिप की कड़ी आलोचना की है।

उन्होंने कहा-

हम इज़राइली, भारतीय, फ़िल्म निर्माता, पत्रकार, शिक्षाविद और एक्टिविस्ट हैं। हम भारत और इज़राइल में यहूदियों और फ़लिस्तीनियों दोनों के लिए बहुलवाद, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थन में लिख रहे हैं। और हम केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा 'द वॉयस ऑफ़ हिंद रजब' पर प्रतिबंध को सही ठहराने के लिए भारत-इज़राइल संबंधों का हवाला देने की कड़ी निंदा करते हैं।

उन्होंने आगे लिखा-

पहली बात तो यह है कि यह प्रतिबंध भारत के संविधान के आर्टिकिल 19 में संरक्षित अभिव्यक्ति की आज़ादी पर साफ़ तौर से ग़ैरक़ानूनी हमला है।

दूसरी बात, सेल्फ़-सेंसरशिप एक दुष्चक्र है। यह दूसरों को भविष्य में इसी तरह की सेल्फ़-सेंसरशिप की उम्मीद करने को प्रोत्साहित करता है। इन घटनाओं से पहले शायद इज़राइल ने भारत में फ़िल्म प्रमाणन के बारे में सोचा भी नहीं होगा। अब भारतीय अधिकारियों ने विदेशी शक्तियों के हितों के लिए फ़िल्मों को सेंसर करने में अपनी फुर्ती दिखाई है।

भारत और इज़राइल दोनों ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर लोकतांत्रिक पतन के अग्रणी होने के दुर्भाग्य से पीड़ित हैं। इस मंच पर मौजूद सरकारों ने अपने-अपने देशों में असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए एक चालबाज़ी से सहयोग करना सीख लिया है।

भारतीय अधिकारियों ने यह दिखा दिया है कि संबंध का उनका मतलब केवल तत्कालीन सरकार को ख़ुश करना है। यहाँ तक कि उनके सबसे जघन्य अपराधों को उजागर करने वाली फ़िल्मों पर भी सेंसरशिप लगा दी गई है।

'द वॉइस ऑफ़ हिंद रजब' में साजा किलानी

इससे पहले, जनवरी में, तेल अवीव स्थित भारतीय दूतावास ने जॉयोनिस्ट विरोधी इज़राइली अभिनेत्री, नाटककार और थिएटर निर्देशक ऐनात वेइज़मैन और उनके थिएटर ग्रुप को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह नेतन्याहू सरकार के साथ मिलीभगत से किया गया था। उन्हें दक्षिणी भारतीय राज्य केरल में हर साल आयोजित होने वाले 2026 अंतरराष्ट्रीय थिएटर महोत्सव (आईटीएफ़ओके) में 'द लास्ट प्ले इन ग़ाज़ा' नाटक का मंचन करना था। वेइज़मैन के शब्दों में- 'यह नाटक ग़ाज़ा के विनाश और नष्ट हुई चीज़ों को थिएटर के माध्यम से फिर से क्रिएट करने के हताश प्रयास के बारे में है।'

सीबीएफ़सी की स्थापना 1952 के सिनेमाटोग्राफ़ अधिनियम (सीए1952) के तहत की गई थी, जिसने 1918 के ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के उस क़ानून की जगह ली थी, जिसमें सरकारी अधिकारियों के किसी भी नकारात्मक चित्रण पर प्रतिबंध लगा दिया था और जिसका उद्देश्य 'सार्वजनिक व्यवस्था' बनाए रखना था, यानी सभी असहमतियों का दमन करना। सीए1952 को 1947 के बाद नाममात्र की स्वतंत्र भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था।

इसमें प्रतिक्रियावादी 1918 के औपनिवेशिक क़ानून के ज़्यादातर हिस्सों को बरकरार रखा गया था, मसलन कुछ उल्लंघनों के लिए तीन साल की क़ैद और एक लाख रुपये का जुर्माना, या दोनों शामिल थे। इस क़ानून में 'बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सेंसर्स' शब्द का भी प्रयोग किया गया था। यह भारतीय पूंजीपति राज्य को फ़िल्म में कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं, इस पर पूर्ण नियंत्रण देता है। इसलिए, सीबीएफ़सी को केंद्रीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड कहना ही सटीक है।

मोदी सरकार के शासनकाल में, सीबीएफ़सी सरकार के हिंदुत्ववादी एजेंडे को थोपने का एक खुला साधन बन गई है। 'हिंदुत्व' शब्द, बीजेपी द्वारा परिभाषित हिंदू वर्चस्ववादी शासन का प्रतिनिधित्व करता है और इसे सबसे पहले साल 1921 में कट्टर प्रतिक्रियावादी हिंदू-फासीवादी 'थिंकर' दामोदर सावरकर ने गढ़ा था, जो हिटलर और मुसोलिनी का प्रशंसक था।

उदाहरण के लिए, 2017 में, सीबीएफ़सी ने नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'द आर्गुमेंटेटिव इंडियन' के निर्देशक सुमन घोष से 'हिंदुत्व,' 'गुजरात,' 'हिंदू' और 'गाय' जैसे शब्दों को हटाने की मांग की थी। ऐसा मोदी की छवि को और धूमिल होने से बचाने के लिए किया गया था। साल 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, उन्होंने हिंदू वर्चस्ववादी शासन थोपा था। गुजरात में 2002 में उन्होंने निर्दोष मुसलमानों के बर्बर जनसंहार को अपनी देख रेख में करवाया था। 'द आर्गुमेंटेटिव इंडियन' गुजरात शब्द के हटाए जाने के बाद ही रिलीज़ की जा सकी।

हिंदू-फासीवादी मोदी सरकार इज़राइल की जॉयोनिस्ट नस्लवादी नीति की गहरी प्रशंसक है और भारत में मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ उसकी दमनकारी नस्लवादी नीतियों को दोहराना चाहती है। इसीलिए वह इतिहास में पतनशील ज़ायोनी शासन की जनसंहारकारी नीतियों को छिपाने के लिए हर संभव प्रयास करती है।

जैसा कि इज़राइली नाटककार ऐनात वेइज़मैन ने 'द वायर' में अपने कॉलम में सही ही लिखा है-

यह भारत और इज़राइल के बीच बढ़ती घनिष्ठ साझेदारी का असली चेहरा उजागर करता है, ज़ायोनिज़्म और हिंदुत्व के बीच एक ऐसी साझेदारी है जो सैन्य, आर्थिक और तकनीकी सहयोग पर तो आधारित है ही, साथ ही एक 'साझा संस्कृति' पर भी आधारित है। अगर ऐसे नस्लवादी राष्ट्रवाद को संस्कृति कहा जा सकता है तो यह यहाँ राजनीतिक और कलात्मक आवाज़ों को दबाने में देखा जा सकता है। भारत केवल इज़राइल से हथियार ही नहीं खरीदता, उसकी साझेदारी इससे कहीं गहरी है, जो प्रामाणिक सांस्कृतिक उत्पादन को राष्ट्रवादी और ऊपर से थोपी गई सरकारी 'संस्कृति' से बदलने की कोशिश कर रही है।

Loading