यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख India’s Labour Code “reform”: A savage attack on worker rights का है जो 11 फ़रवरी 2026 को प्रकाशित हुआ था।
घरेलू और विदेशी पूंजी द्वारा भारत के मज़दूर वर्ग के अति शोषण को और तेज़ करते हुए, धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने देश के श्रम क़ानूनों में व्यापक बदलाव को लागू कर दिया है। 29 केंद्रीय श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके उन्हें चार लेबर कोड्स यानी श्रम संहिताओं में समेट दिया गया है। ये क़ानून न्यूनतम मज़दूरी, काम के मानक और संगठित क्षेत्र यानी मझोले और बड़े सार्वजनिक उद्यमों और प्राइवेट कंपनियों में सामूहिक वेतन समझौते के मज़दूरों के अधिकारों के लिए बने थे।
नए श्रम क़ानूनों—वेतन संहिता (वेज कोड), 2019; औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड), 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता (सोशल सिक्युरिटी कोड), 2020; और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां संहिता (ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन), 2020—को भारत के कॉर्पोरेट जगत ने श्रम क़ानून में दशकों में 'सबसे महत्वपूर्ण बदलाव' करार दिया है। ये क़ानून वेतन, नौकरी की सुरक्षा और काम के हालात से संबंधित उन क़ानूनी सुरक्षा उपायों को ख़त्म कर देते हैं, जिन्हें मज़दूरों की कई पीढ़ियों ने लंबे और कड़े संघर्षों के ज़रिये हासिल किया था।
बेशक, भारत के नए श्रम क़ानूनों की सबसे प्रतिक्रियावादी ख़ासियत, मज़दूरों के हड़ताल करने के क़ानूनी अधिकार पर लगाए गए गंभीर प्रतिबंध हैं। इन उपायों से उन 'आवश्यक सेवाओं' के प्रावधानों का दायरा बहुत बढ़ जाता है जिनके तहत मज़दूरों के हड़ताल पर बैन है, और इससे मज़दूरों को हड़ताल करने का क़ानूनी अधिकार हासिल करने में कई नई क़ानूनी अड़चनें पैदा होती हैं। इन उपायों के साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी हिंदू वर्चस्ववादी बीजेपी असल में सामूहिक हड़ताल और मज़दूर वर्ग के संगठित प्रतिरोध को अपराध बना रहे हैं।
मोदी और बीजेपी जब दूसरी बार जीतकर सत्ता में पहुंचे, उसके कुछ ही दिनों बाद 2019-20 में संसद में चार लेबर कोड्स को स्वीकार किया गया था। और यह सरकार के दक्षिणपंथी रुख़ में आए एक तेज़ बदलाव का ही हिस्सा था, जिसके तहत सरकार ने बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट टैक्स में छूट दी, कई किसान-विरोधी और कृषि-व्यापार समर्थक क़ानून लेकर आए और भारत के एकमात्र मुस्लिम-बहुसंख्यक राज्य जम्मू एवं कश्मीर को केंद्र सरकार के नियंत्रण वाले केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया।
हालांकि पिछले साल के अंत में श्रम मंत्री ने संसद को बताया था कि नए केंद्रीय लेबर कोड्स को आधिकारूप से रूप से लागू कर दिया गया है। लेकिन बड़े उद्योगों की ओर से लंबे समय से की जा रही मांग के तहत इन बदलावों को लागू करने में सरकार की ओर से हुई देरी के पीछे कई कारण हैं। इसमें 2020-21 में लगभग एक साल तक चला किसान आंदोलन भी एक कारण रहा और बीजेपी सरकार का वो डर भी एक वजह थी जिसमें उसे लग रहा था कि अधिकांश राज्य सरकारों द्वारा इसे लागू करने के लिए आवश्यक क़ानूनी तंत्र बनाने से पहले अगर लागू होने की घोषणा कर दी गई तो मज़दूरों के व्यापाक विरोध को देखते हुए ये सुधार पटरी से उतर सकते हैं। (भारत के संविधान के तहत, श्रम क़ानून एक समवर्ती विषय है, यानी जिसमें केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की नियामक भूमिकाएँ हैं और इन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों को सौंपी गई है।)
मोदी सरकार अब सभी राज्यों से नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत यानी एक अप्रैल तक अपने नए श्रम क़ानूनों को अपनाने का आग्रह कर रही है। अब तक भारत के 28 राज्यों में से कम से कम 17 राज्यों ने, जिनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और विपक्षी दलों द्वारा शासित तमिलनाडु और कर्नाटक शामिल हैं, नए श्रम क़ानूनों को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठाए हैं।
वैश्विक ट्रेड वॉर और बढ़ते भूरणनीतिक तनाव से निपटने के लिए सरकार और भारतीय सत्ताधारी वर्ग की जवाबी कार्रवाई में बस यही मुख्य तत्व है- मज़दूर अधिकारों पर हमला और मज़दूरों की संयुक्त कार्रवाई यानी हड़ताल पर नए प्रतिबंध लगाना। अपने प्रतिद्वंद्वियों की तरह ही भारतीय पूंजीपति वर्ग को गहरा विश्वास है कि उसे शोषण की दर को नाटकीय रूप से कई गुना बढ़ाना पड़ेगा और समाज से संसाधन का और बड़ा हिस्सा हथियार खरीदने और युद्ध की तैयारी में लगाना होगा। चार लेबर कोड्स का एलान करने के तुरंत बाद, बीजेपी सरकार ने भारत की राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) स्कीम को समाप्त कर दिया, जो करोड़ों ग़रीब भारतीयों के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा थी। इसका स्पष्ट उद्देश्य खेतिहर मज़दूरों की मज़दूरी को कम करना था। एक फ़रवरी को पेश किए गए बजट में, बीजेपी सरकार ने सार्वजनिक खर्च में कटौती जारी रखते हुए सैन्य खर्च में 15 प्रतिशत की और वृद्धि की है, जिससे यह कर्ज भुगतान के बाद, बजट का सबसे बड़ा मद बन गया है।
मोदी और उनकी बीजेपी ने लेबर कोड्स सुधार को, सरलीकरण और आधुनिकीकरण के प्रयास के रूप में प्रचारित किया है, जो भारत में 'ईज़ ऑफ़ डूईंग बिज़नेस' को बेहतर बनाने की उनकी कोशिशों का हिस्सा है। वास्तविकता में, यह पूंजी के हितों में वर्ग संबंधों को पुनर्गठित करने के लिए सरकार के निरंतर आक्रमण का एक केंद्रीय घटक है - जिसमें हायर एंड फ़ायर को आसान बनाना, असुरक्षित रोज़गार का व्यापक विस्तार करना, सार्वजनिक क्षेत्र की सुरक्षा को कमज़ोर करना और बेरोज़गारी, बीमारी और वृद्धावस्था की सामाजिक ज़िम्मेदारियों को मज़दूरों पर डालना शामिल है।
मोदी के एजेंडे को सुमता डावरा ने खुलकर पेश किया. वो श्रम मामलों की केंद्र सरकार की सचिव रही हैं और उन्होंने पांच दिसंबर को फ़ाइनांशियल टाइम्स में 'लेबर कोड्सः ए गेम चेंजर फ़ॉर इंडियन इकोनॉमी' शीर्षक से एक लेख लिखा था। डावरा ने लिखा कि 'श्रम क़ानून और इन क़ानूनों के अनुपालन को लंबे समय से निवेशक 'बोझ' की तरह देखते रहे हैं।' उन्होंने जोड़ा कि उम्मीद है कि नए ढांचे से भारतीय उद्योगों की 'प्रतिस्पर्धात्मकता' बढ़ेगी।
नौकरी की असुरक्षा, गिरते वास्तविक वेतन और बिगड़ते हालात का सामना कर रहे लाखों मज़दूरों में बढ़ते आक्रोश के बीच, दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने गुरुवार, 12 फ़रवरी को एक दिवसीय आम हड़ताल का आह्वान किया। हालांकि यूनियनों की मांगों के 'चार्टर' में निजीकरण और न्यूनतम वेतन में वृद्धि सहित कई मुद्दे शामिल हैं, लेकिन हड़ताल का केंद्रीय मुद्दा बीजेपी का बड़े उद्योगों के हित में श्रम 'सुधार' को रद्द करना है।
लेबर कोड्स के ख़िलाफ़ विरोध चौतरफ़ा है, करोड़ों मज़दूरों के इस हड़ताल में शामिल होने या रैलियों में शामिल होने की उम्मीद है। हालांकि ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) और सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) समेत यूनियनें इस हड़ताल को पूंजीवादी सत्ता तंत्र से अपील तक सीमित करने के लिए काम कर रही हैं, और यह सब मज़दूर वर्ग को कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाले विपक्षी इंडिया गठबंधन के पीछे लाने की उनकी कोशिशों के हिस्से के तौर पर है। अभी हाल तक राष्ट्रीय सरकार में पूंजीपतियों की चहेती रही कांग्रेस पार्टी, 'निवेश परस्त' नीतियों और चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत के गठबंधन की कट्टर समर्थक है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार, बीजेपी के लेबर कोड को स्वीकार करने वाली सबसे आगे रहने वाली राज्य सरकारों में से एक है।
नए श्रम क़ानूनों को सरसरी निगाह से भी देखने से उनका श्रमिक-विरोधी स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।
वेतन संहिता, 2019 यानी वेज कोड- न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 और बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 सहित चार प्रमुख श्रम क़ानूनों को एक ही ढांचे में समेटती है। इसका मुख्य आधार राष्ट्रीय 'न्यूनतम मज़दूरी' है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा। हालांकि इसे मज़दूरों की भलाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन संहिता जानबूझकर मज़दूरी को उन जीवन जीने लायक मज़दूरी मानकों से अलग रखती है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के रैप्टाकोस ब्रेट फ़ैसले में स्थापित किया था और जिसमें बुनियादी पोषण और सामाजिक ज़रूरतों पर विचार किया गया था। न्यूनतम मज़दूरी को इन आवश्यक मानकों से अलग करके, संहिता देश भर में ग़रीबी रेखा से नीचे की मज़दूरी का रास्ता साफ़ करती है, पूंजीपतियों के हित में मज़दूरी नियंत्रण का केंद्रीकरण करती है और मज़दूरों के व्यवस्थित शोषण को बढ़ावा देती है।
इस संहिता में 'वेतन' की एक समान परिभाषा दी गई है, जिसके तहत मकान किराया और परिवहन भत्ता जैसे भत्तों को कुल वेतन के 50 प्रतिशत तक सीमित किया गया है। इस मद में इससे अधिक राशि को भविष्य निधि (पीएफ़) और ग्रेच्युटी अंशदान की गणना के लिए मूल वेतन में जोड़ा जाता है। हालांकि इससे सामाजिक सुरक्षा कोष में मामूली वृद्धि हो सकती है, लेकिन इससे लाखों मज़दूरों, विशेष रूप से कम वेतन वाले सेक्टरों में काम करने वाले लोगों के हाथ में आने वाले वेतन में कमी आएगी।
श्रम क़ानून को लागू करने के लिए पहले से ही कुख्यात ढुलमुल तंत्र को और कमज़ोर कर दिया गया है क्योंकि लेबर इंस्पेक्टरों को 'इंस्पेक्टर कम फ़ेसिलिटेटर' का दर्ज़ा दे दिया गया है। इसके अलावा ऑनलाइन आधारित जांच का दायरा बढ़ा दिया है और फ़ाइन लगाने के प्रावधान ने अब पैसा देकर सज़ा से बच निकलने के लिए मालिकों को एक और सुविधा दे दी है।
औद्योगिक संबंध संहिता (आईआरसी) यानी इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड, रोज़गार सुरक्षा पर सीधा हमला है। पिछली व्यवस्था के तहत, स्थायी रोज़गार औपचारिक मानक बना हुआ था, जबकि ठेका मज़दूरी को केवल अस्थायी या मौसमी कामों तक ही सीमित रखा जाता था। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के नियोक्ताओं द्वारा सालों से इन प्रावधानों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया जाता रहा है। हालांकि, आईआरसी अब इसे पूरी तरह से वैध ठहराता है और निश्चित अवधि के रोज़गार (फ़िक्स टर्म एम्प्लायमेंट) को क़ानूनी रूप से संस्थागत रूप देता है। नियोक्ताओं को अब छह से ग्यारह महीने के अनुबंध पर मज़दूरों को काम पर रखने की अनुमति होगी और उन्हें उन कामों के लिए कांट्रैक्ट को रिन्यू करने की कोई बाध्यता नहीं होगी, जिन्हें दरअसल परमानेंट मज़दूर करते हैं।
छंटनी के लिए सरकारी मंज़ूरी की अनिवार्य सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 कर्मचारियों तक करने से छंटनी संबंधी सुरक्षा उपायों की और कमर तोड़ दी गई है। सरकार चाहे तो कार्यकारी अधिसूचना के माध्यम से इस सीमा को और बढ़ा सकती है। इन बदलावों से न्यूनतम नौकरी सुरक्षा उपायों के दायरे में आने वाली कंपनियों/कारखानों की संख्या में भारी कमी आई है, जिससे 'हायर एंड फ़ायर' की प्रथा में व्यापक विस्तार हुआ है।
आईआरसी हड़ताल के अधिकार पर सीधा हमला है। पूर्ववर्ती औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत, हड़ताल संबंधी प्रतिबंध मुख्य रूप से सार्वजनिक उपयोगिता वाली सेवाओं पर लागू होते थे। नई संहिता इन प्रतिबंधों के दायरे को लगभग सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों तक विस्तारित करती है और मज़दूरों के क़ानूनी रूप से हड़ताल करने से पहले कई प्रक्रियाओं से होकर गुजरने की बाधाएं खड़ी करती है।
अब मज़दूरों को हड़ताल की सूचना 60 दिन पहले देनी होगी, और सुलह, न्यायाधिकरण या मध्यस्थता की कार्यवाही के दौरान और उसके बाद कई हफ्तों तक हड़ताल करने पर प्रतिबंध रहेगा। चूंकि नियोक्ता या सरकार आसानी से ऐसी कार्यवाही शुरू कर सकते हैं, इसलिए हड़तालों को अनिश्चित काल के लिए टाला जा सकता है या प्रभावी रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है। इन शर्तों का उल्लंघन करने वाली किसी भी हड़ताल को अवैध घोषित कर दिया जाएगा। इससे मज़दूरों और यूनियनों पर ज़ुर्माने और मुक़दमे की तलवार लटकती रहेगी। इस प्रकार, यह संहिता नियोक्ताओं और सरकार के हाथ मजबूत करती है, जबकि मज़दूरों के प्रतिरोध को अपराध घोषित करती है और 'औद्योगिक शांति' और निवेशकों के विश्वास के नाम पर स्वतंत्र औद्योगिक कार्रवाई यानी हड़ताल को दबाती है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020, यानी कोड ऑन सोशल सिक्यूरिटी- कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम और कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम सहित नौ मौजूदा क़ानूनों को खुद में समेटती है। हालांकि यह नाममात्र के लिए असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कवरेज देती है, लेकिन यह मान्यता भी जानबूझकर खोखली ही है। गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को स्पष्ट रूप से कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया गया है, जिससे उबर, ओला, स्विगी और ज़ोमैटो जैसी कंपनियों को सामाजिक सुरक्षा लाभ देने की ज़िम्मेदारी से छुट्टी मिल जाती है।
लागू करने लायक अधिकारों के बजाय यह संहिता, कंपनियों के कारोबार पर लगाए गए मामूली लेवी (शुल्क) से इकट्ठा किए गए एक विवेकाधीन कल्याणकारी ढांचा (फ़ंड) स्थापित करती है। सामाजिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कंपनियों से हटाकर सरकार पर डाल दी गई है, जिससे तेज़ी से पैर पसारती अनौपचारिक और प्लेटफ़ॉर्म आधारित अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता और भी बढ़ जाती है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम (बीओसीडब्ल्यू) को रद्द करने से निर्माण मज़दूरों के लिए गंभीर परिणाम होने का ख़तरा पैदा हो गया है। 11 सालों के संघर्ष के बाद पारित बीओसीडब्ल्यू अधिनियम- पेंशन, मातृत्व लाभ, छात्रवृत्ति, कर्ज के लिए सेस यानी उपकर (या विशेष कर) द्वारा वित्तपोषित सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाता है। इसके रद्द होने से लगभग 4 करोड़ मज़दूरों का पंजीकरण रद्द हो जाएगा, 36 राज्य कल्याण बोर्ड भंग हो जाएंगे और मज़दूरों को अन्य असंगठित मज़दूरों के साथ नई योजनाओं के तहत पुनः पंजीकरण कराना होगा, साथ ही उन पर अंशदान की ऐसी शर्तें लागू होंगी जिन्हें वहन करना कई लोगों के लिए मुश्किल होगा।
संहिता की धारा 142, पंजीकरण के लिए आधार को अनिवार्य बनाकर लाखों लोगों को और भी अधिक हाशिए पर डाल देती है, जिससे प्रवासी और असंगठित मज़दूरों के लिए दस्तावेज़ीकरण की कमी और सीमित डिजिटल पहुंच जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। सामाजिक सुरक्षा सशर्त कल्याण तक सीमित हो जाती है, जो सरकार की मर्ज़ी और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर करती है।
आक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड यानी व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों संबंधी संहिता, 2020- कारखाना अधिनियम, 1948 के तहत स्थापित सुरक्षा उपायों पर सीधा हमला है। कंपनियों/कारखानों में सुरक्षा मानक और स्वास्थ्य सुविधाएं लागू करने के लिए श्रमिकों की संख्या सीमा को दोगुना कर दिया गया है। बिजली से चलने वाली इकाइयों में यह संख्या 10 से 20 जबकि बिना बिजली वाले कारखानों में यह संख्या 20 से 40 कर दी गई है। इससे लाखों मज़दूर क़ानूनी रूप से लागू होने लायक सुरक्षा और स्वास्थ्य नियमों के दायर से बाहर धकेल दिए गए हैं। इसी प्रकार, लाइसेंसिंग मंज़ूरी को 20 से बढ़ाकर 50 मज़दूरों तक करने से ठेका श्रम सुरक्षा उपायों को भी कमज़ोर कर दिया गया है, जिससे निगरानी में भारी कमी आई है, अनौपचारिकीकरण को बढ़ावा मिला है और काम की जगह जोख़िम का भार कंपनी की बजाय मज़दूरों के कंधों पर आ गया है।
हालांकि संहिता में नाममात्र के लिए आठ घंटे का कार्यदिवस बरकरार रखा गया है, लेकिन यह 12 घंटे तक की शिफ्ट और तीन महीने में 125 घंटे तक के ओवरटाइम की अनुमति देती है। गिग और असंगठित मज़दूर अभी भी लागू होने लायक सुरक्षा उपायों से बाहर हैं और अनिश्चित कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर हैं।
भारत के 40 करोड़ से अधिक मज़दूरों में से लगभग 80 प्रतिशत क़ानूनी सुरक्षा से वंचित हैं और असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। ऐसे में, मज़दूरी नियोक्ता की मर्ज़ी पर निर्भर करती है और काम के घंटों पर कोई अनिवार्य न्यूनतम सीमा या प्रतिबंध नहीं है। इन हमलों से करोड़ों लोगों के घोर संकट में धकेले जाने का ख़तरा पैदा हो गया है।
